جمعه ۲۱ آذر
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قطعا به لطف بودنت این خانه زیبا می شود
یک بار دیگر در دلم احساس احیا می شود
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دست و پا نمیزنم
ارام نشسته و غرقم..
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یک غزل و یک ترانه از مهدی ملکی الف
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مثنوی
《زاهدانه_گوش کِشان》
آمده ام، که سوی تو، روان شوم ،دوان، دوان
مرا بگیری، از خودم ،دوا
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افسانهی زیباییِ لیلی و دلِ عاشقِ مجنون،
هر کس که شنیدش، به تبِ عشق شد افزون.
دل، غرقِ غمِ عشق ش
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( هاشم )
با مرغ دلم که از پر و بال گذشت
یک سال نبودن تو صد سال گذشت
ترمیم نشد دگر عذاب دل من
ا
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من در دل یار و یار در دل
خنده زده او بر من ِخوش دل
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بغض می ترکید و با اشک جان را کرد سیر
آه چه دیر فهمیدم دشمن را، آه چه دیر
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لختی برای این که بدانم که کیستم
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آرزوهایی که تنها در خیال شکل میگیرد.
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تویی ز قوم بربر
منم ز کاخ مرمر
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شده شبها بدهی تکیه سرت شانهٔ خود
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پرتو نور نگاهت ، زندگی باشد مرا ای مادرم
خستگی ها از تنم بیرون شود با خنده هایت مادرم
من به یادم
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پاییز فصل برگریزان است،
فصل دیدار عزیزان،
زیر باران است.
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دیده حسرت می برد عطر شب بوی تو را
در خیالم می دیدم سیمای نیکوی تو را
غم مداوا می کنی ، با هر با
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گر چه امّید مرا فاصله ها دزدیده
به خدا لحظه به لحظه ، به تو اندیشیده
گیج و مبهوت، پریشان و ب
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زمین
در تباهنای خویش
نه باران پذیرفت
نه شکوفه.
من
در حفرههای سِتَروَنش
جُستوجو کردم
شاید رُ
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دلنگاشتهای از کتاب ترنّم احساس
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بباران بارِشَت، ای عشقِ مطلق،
که طائر، عاشقِ آن، حکمِ بر حق.
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در حافظه ام عکس تو نقش بسته است..
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یک جزیره باش در من ،در درون شهر رویا
با تو یک افسانه باشم پادشاه و زن تنها
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حالا حنایت را ببین ! رنگش چرا بیرنگ شد
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درغروب نیزاری ماه پیدا شد
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کنار باجهی تلفن نشسته بود
دوباره از همه دلگیر و خسته بود
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دراین دنیای مالامال ز تبعیض
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گوهرش زینب که صبرش گشته الگویی به فَرّ
درّ و یاقوتش حسَینان باشد او را شَه پسر.
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کبوتر بازی من هم عالمی دارد
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تو را فراموش نمی کنم
هر روز
روبروی غروب ساحلِ گرگر
می خوانم ،ترانه
بلم رونم تو کارو
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شاید از عشق تو من شاعر شدم
شاید از تنهایی و درماندگی
شاید از موی مش ات حیران شدم
شاید از لبخندت
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دلم برای بوی بخاری نفتی مان پر می کشد
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شهرِ یاران را خدایان مردهاند ای شهریار
کاش میشد اندکی هم در صفِ یاران بمانم
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هر بار چشید طعم چشمت، چشمم،
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طلایه دار
نبسته ام به کسی دل مگر وفای تورا
نکرده ام به سر خود مگر هوای تو را
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در شوقِ رازِ هستی، شب از زبان یاران
گفتم چه باشد این جان؟ گفتا نسیمِ جانان
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از تبار کدام دستی
که یخ میزنی
در تلاقی اندام؟...
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صدایم کن! نگاهم کن! ببین آشفته احوالم!
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یادت باشه که بی من آسمونت
نداره دیگه هیچ رنگین کمونی
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راستش را بخواهی
آمده است
از جنوب آلوده به آفتاب
زنی که
در ثانیه شمار ساعت
از قهوه خانه ی م
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چشم ها
خالی آسمان را
وجب می کند تا لکه ابری
ماه شب چهارده ام
قطره ی باران
خیالم را تر نکن
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در دستهای لطیف باد
چه عاشقانه لمس
دستهای
با احساس
نغمه سر می داد
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به احترام نام عشق شاعر علی نظری
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حالا تو پر از حال منی یا که رهایی؟
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گاهی وقتا که دلت تنگ میشه
تو دلت با همه کس جنگ میشه
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از غیرت شیطان به خداوند همین بس
در سجده ناکرده هم آموخته ای هست
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ساقی دو باده نوریله یاندیر بو جامیمیز
مطرب دئنن کی دونیا شیرین لتدی کامیمیز
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علینین اول اولان جانثاری زهرادی
ولایته سپر و دین شعاری زهرادی
مدافع حرم و مادر حسین و حسن
پیمب
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