جمعه ۲۱ آذر
شعر قصیده
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گفت: گر که رفتم تو مرا یاد کنی....
باز خاطرههایم را در ذهن خود آباد کنی...
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شنو ای خردمند روشنروان
بگویم تو را نکتهای در نهان
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علینین اول اولان جانثاری زهرادی
ولایته سپر و دین شعاری زهرادی
مدافع حرم و مادر حسین و حسن
پیمب
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راه دل می بندی چرا به دلم.....
نکند که بیراهه آمدست راه را دلم.....
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کجاست آن بوسههایی که بر گونه میزدی.......
حالا جای بوسههای تو را اشک گرفته است.....
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زیر چتر مهر
بیست و پنج آذر
شب به هر نگاهی پنجه بر چشمک می زد
در ره عشق سکه ها پرتاب
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ز گیتی جز از مرد دانای پیر
ندارد کسی بهره ی دستگیر
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درد دل من فراق جانان و غم وطن بود
گویا از این همه حسرت و انتظار سرد شدی
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نو روز رسیدست و ما عید نداریم
مانده در دلم حسرت دیدار بخندم
جمعه فهمیده که بنزین گران است
بر ج
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بخار پنجره را با نوازش انگشت
برای رسیدن به کوچه میروبم
نگاه سرد خودم را بدون هر حسی
به تکتک د
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من باشم و تو را در دربار بیابم
شاید خالی تر از معنی در اسرار بیابم
وقتی صبح بیدار میشی هر روز ز
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«قدح»! مگو سخنِ خشم با سفیه زمان
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وطن آن نیست که از خون شهیدان گذری
زیر پرچم، به نفاق و ستمی جان ببری
وطن آن است که دل با دل مردم با
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خم اَبروی تو و طَرفه ی گیسوی تو باز....
دل من دست گدایی، سوی توآورده نیاز....
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به مشکل های کوچک لاکن از دیدم گرفتاری
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راه بقا .حکیما نه 8
تو که می دانی که نادانی چه هاست
ابلهی يا احمقی دامِ بلاست
راست شو باعلم تا د
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طعنه ها با خنده بحالم نشاندند
مگر من خواستم این زهر جانکاهی را سر بکشم
دلتنگم از این دوری و بی کسی
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آن زمان که من نگاهت را....
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مرادِ دل
اگر خواهی مراد دل بدانی
به کوشش دست گیر بر ناتوانی
به زیر افکن غرور د
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هرچی انتظارکشیدم ازتوخبری نیست....
شب تاریکم راگویاسحری نیست.....
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وقتی که از این کوچه رفتی پشت پایت
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طلب عشق
در خیالات محالم چون که دیدارت کنم
در وجودت نازنین ، عشقم پدیدارت کنم
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نفسم تازه به عشق است و دلم گرم به او
«نارفیق» از چه بکوشی که کنی گمراهم
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هر شب تا سحر گاهان ساقیان ساربانان دل اند
می اندر جام و اندر دل هر دو عزیزان دل اند
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شام اگر آیینهدارِ خشمِ شبهای ستم،
کربلا آیینهدارِ کبریا با اربعین
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دریده چرا گرگ باورت بره درون
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عجب نقشی زده رویت
به روی قرص ماه هرشب
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سوز چوخدی (یاسمین)ولی فرصت گرانیدی
قان شرم ائدیر ولی دیلی یوخدی نوا ائده
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هر کسی گفته که ثروت باطل است
گندم ری خورده و سیب مزار
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شنو سازم بیان از کربلا و حزن سوزانش
عجب جان سوز می باشد غم سلطان خوبانش
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گفتم به پیر که نصیحت کُنم، به چند
گفتا به گوش باشُ و شنو به نوش
گفتم که سالهاست، اسیر گشته ام به ر
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چند حیوان بهر سازش با امیر
طینت خود را گرفتند با حریر
هر کدام آورده بودند پیشکشی
تا که شاید آبر
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مرغکی آمد به دنبال جواب
پیش دانا نامی چون افراسیاب
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تـشـنـه و سـیـرابِ سَـرابـم ، کــویــر !
پــایِ رســیــدن ، نــرســیــدم ؛ بَــسِــه
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اساتید گرامی، نوشته های بنده در قد و قواره ی شعر خطاب شدن نیستن، بنابراین پیشاپیش از حسن توجه و وقتی
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چوخ گزمیشم جوامعی من آب و تابیلن
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ای جان جهان، بیا که بی تو دل افسرده ست
دل، در به در غزل، ولی قلم پژمرده ست
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رحمی بنما چشم دگر خواب ندارد ...
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بی خداحافظی ازشهربدررفتی تو
همه گفتندعزیزم به سفررفتی تو
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تهمینه به رستم چه بگوید
چون شاخه شمشاد چو سهراب ندارد
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این شعر، یادآور تلاش مستمر، ایمان و امید است؛
ما با دست خود آینده را میسازیم، در مسیر نور و صلح.
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زندگی را می شود زیباتر ازچشمت ببینی
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تو با یکی دیگه ای/ منم کنارت داری
خوشی کنارش حتما/ تو که ازم فراری
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آن چادُرسیاه چشم مشکی....آن بالابلندسرومُشگین....
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اَلسَالم عَلیک یا شَمسَ الشُمُوس،
باشی در زیبایی وَصف طاووس.
یا غَریباَ الغُرَبا وَ الضُّعَفا،
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تن سرخ تب دارت را به کدامین طبیب بسپارم امید سرزمینم؟🥀🖤
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گه به نیزه، گاه در گودال و گاهی در تنور
آسمان سرگشته از این حال سرگردان سر
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نه من دیگر پریزادم نه ناز نسترن دارم
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ما به رنگ نور یاران نوبر ایم
ما به سبک هور بر سرها سر ایم
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سهم دلم از عشق فقط آه و شرر شد ...
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درونِ کهکشانی از مقوله ها مُعلّقم
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روزی یک انسان جادوگر
بیا ببین چه توری پهن کرد
با اشعه چشم و سحر درون
آن من را باخود زبان بندکر
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ما مرد میدانیم اما صبر داریم
از داغ سید دیده ای پر ابر داریم
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