جمعه ۲۱ آذر
شعر عرفانی
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ز طاق ابروی جانان به خاکم
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بر یک نظری کنی به ذاتش کاشی
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تو خندان روی و من خنـدان پسندم
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قلبیم نه جور فِکر اِئتمیسن ، عُذرینده اول تقصیرلارا
اوندان سنه چوخلی وفا ، سندنده کی چوخلی جفا
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🩵به راه تو برگشتم، یا رَب، همین مانَد
عهد نو، تو را بستم، یا رب، همین ماند
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قطرهام،
اما به دریا میروم
من به استقبالِ آنجا میروم
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هر که آمد به حرم وه که چه مبتلای توست،
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پروردگارم توراسپاس که بی گناهم
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مثنوی
《زاهدانه_گوش کِشان》
آمده ام، که سوی تو، روان شوم ،دوان، دوان
مرا بگیری، از خودم ،دوا
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بباران بارِشَت، ای عشقِ مطلق،
که طائر، عاشقِ آن، حکمِ بر حق.
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گوهرش زینب که صبرش گشته الگویی به فَرّ
درّ و یاقوتش حسَینان باشد او را شَه پسر.
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ساقی دو باده نوریله یاندیر بو جامیمیز
مطرب دئنن کی دونیا شیرین لتدی کامیمیز
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ای شمس من ای مــاه من
ای مونـــــــــــــــــــس آگــاه من
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میکده گیرد غم بیچاره دل ات را
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مثنوی
《مثنویِ خون در دل》
میبینم او را با دوچشم ،
آری دوچشمه، خون فشان
او گشته ،در جانم شرر
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اقیانوس
اقیانوس؛
آرام می گرفت
خوابش می برد.
موج اش که روشن می شد
آواز می خواند.
دریا خطا می
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به صد روزی قبل،آمار شب هایی که بُوَد تارم
سرّ جایی هستم،کاشانم، رِضوانیم بُوَد، یارم!
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وز آتشِ نمرودِ بت،بر حق آن مَه روی نور
آید خوش و خرم برون، مهرِ سلامت می رسد
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خدايا تويي درمان، دوايم ببخش
به احسان به لطفت گواهم ببخش
به فردوس اعلا بی پناهم ،پناهم بده
ز
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در میانهی جانم،
تشعشعات نوریست از انوار عدالت،
پرتویی از دستِ نخستِ ایمان،
و ستونی از صلابتِ یق
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در دل شب می رسد آوای جان افشان عشق
در دم مستی فزای نم نم باران عشق
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🌺این جهان با مهر و نیکی، وَه که جایی بهتر است
گر مدارا کردی و سازش، که راهی بهتر است
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«زاهدانه_ لن ترانی»
همه از تو مینویسند ،
که تو، خالق جهانی
زاهد از تو مینویسد،
به دلیلِ آن
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اگر عاقل ترین اهلی یِ جنّت، «ترکِ اولی» کرد
برایش «شبهِ تاوان» شد هبوط آدم و حوّا
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به خودت نیامدهای چرا بزنی سپس بدر از قفس؟
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نه زر بمانَد و نه تخت و نه تاج،
نه کاخ ونه گنج و نه باغ و نه عاج
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زمین ، یکپارچه است
دریا ادامهی کوه
کوه ادامهی دشت
و من ادامهی همهی آنها
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جهان جایی است همچون یک بیابان
درونش خار و خس دارد فراوان
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باتو آه
تابه خدمت
گلو ..برسد ،
بغض بندگی
خاک شدنی
نیست که نیست...
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ای آنکه در نبض برگها میتپی،
مرا در بر بگیر—
نه از بالا،
که از ریشهها،
از جایی که خاک
به آسم
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ساقی ز باده پر کن،پیمانه را پیاپی
مطرب بزن تو سازی،امّا نباشد آن نی
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غزل
《زاهدانه_شاهرگ》
برخیز، مرا بنگر،
بنگر، که چه ویرانم
بنگر، که همه شورم ،
بنگر همه، ایم
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از قافله عشق اگر جا مانی
چون گمشده ای تا به ابد حیرانی
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باز آی به میخانه که آن قبله ی راز است.
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هر ماه به نور تو به مَه فَرّ داده...
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از خاطر خود،خاطر جز یار ببر
تا عشق حقیقی بکند در تو اثر
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💚دلِ من پر از شادی و شور بود
جهانم شگفت و پر از نور بود
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اندیشهام
در مهِ تکرار گم شده،
زبانم
به یاوه سرایی خو گرفته،
و دلم
به عادت بی احساس بودن،
به خ
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مگر ببینمش به خواب، چو وصلش شده سراب...
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باید بنویسم خاطرات در هم ریخته ام را
همان گونه که مام وطن پنداشت...
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و چه غریبتر،
آن مردیست که در خانهاش نیز تنهاست —
میان اهل و عیالش،
چون سایهای آرام.
او سجاده
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آینه ها سراب راه خویشتنش ببین خود آ...
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ای پناه لحظه های بی صدا ...
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حق بنده لری پرده ی پنداری آتیب لار
مین یول یولاغی سِیر اِئدیب اللّهه چاتیب لار
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مدّتی هست شدم عاشق و دیوانه او
شده ام مست و خراب از می مستانه او
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خداحافظی،
بریدن از همهی صداهاست
در میان مردم بودن،
و با هیچکس نبودن.
و پس از آن،
جهانی آرام
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خوشا آنکس که او آمد به در زین بحرِ طوفانی
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چو بستم دیده بر دنیای فانی
به چشمانم بدیدم هر نهانی
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از خاطره ی تشنه ی باران تو دارم
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