جمعه ۲۱ آذر
شعر خدا حافظی و جدائی
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دل دلبر شکستم من ندانستم خطا کردم
نماندم بر سر پیمان ، به محبوبم جفا کردم
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مصرع آخرین بود، غروب یک مسافر🌺
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پرندگانِ پرزدهیِ
پرکشیدهیِ پراندیش
گاهی نه به دوردست
که از دست میروند.
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در تهی خانه ی این شهر صدایت جاری است
تو یه آوار سکوت قامت انسان دادی
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خوشی رفت و دگر اینجا تـو نیستی
نمی دانــــــــــم که در رویـــــــای کیـستی
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از غیرت و مِهر و دوستی سَر بودی
نزد همه محترم و سَرور بودی
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برای برادر جوانمرگم که دست نامردی نیمه شب او را پرپر کرد و تمام اعضای بدنش به دیگران اهدا شد و جان
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سوت قطار شنیده میشود و روی
ریل....
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* سرو و پاییز
من از پاییز رنگارنگ میترسم
چو برگانی که دل دادند
به این سرخی
به
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یقین دارم این اتفاق، اشتباهی نبود
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در مورد زندگی و اتفاقات مربوط به آن سخن گفته شده است.
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وقتی تو نباشی به کنارم من تنها چه کنم
آوای تو در گوشم و چشمت که نبینم چه کنم
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این رَد پایِ مانده ، بَر دِل چه بی رِضایَت
پاهایِ دیده اَم را ، چَسبانده جایِ پایَت...
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خوشا تنهایی و با خود نشستن
.....
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رفتــی و کنـــدی زمـــــــن دل
مـــــاهــــــــره عشـقم زمنــــزل
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گریه کردم برسرگورت بادموهایم رابه هم می ریخت...
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به آخرین تکان خداحافظی
به دستی که همه چیز را مثل خاکستر
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امروز بعد از مدت ها دیدمش...
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داغ پدر لا تَبردُ ابدا🕯🖤🕯
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تمومه واسه من
اون همه خاطره
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دایره بستندبرسرگورپدر،چون کلاغان سیاه!
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دلی از درد فراق آکنده
روحی از ظلمت اینجا رانده
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شدم عاشقِ کسی
که منو دوسم نداشت
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✍️تصنیف سرا: م.مدهوش(یامور)✨
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به روزی که هجرش کند خشک نای
کزان دوریاش مرگ خواهی به جای
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تن سرخ تب دارت را به کدامین طبیب بسپارم امید سرزمینم؟🥀🖤
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رفتی آزاد و رها من گیرم
رفتی و بی تو جوانی پیرم
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قورباغه ماند و برکه و سکوتی
که میزد موج در آیینهی دنیا
که آوازی برآمد از دلِ آب:
"گل از پروانه
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پدرم رفت و دلم رفت و دلم رفت
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ازشبستان زنانه ی مسجدصدای گریه می آید......
زن جوانی باصدای بلندریزمی گرید......
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وسط شهر خودم دگر مرا دار بزنید // بجای گریه و ناله فقط کف بزنید // ما که ناحق برفتیم سر آن چوبه دار
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در خاطر خاک آرمیدن حق است..
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مادر ای فرشتهی مهربون،
ای روشنی بخش آسمون،
یادت همیشه تو قلب ماست،
جات تو بهشت پیش خداست.
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مَردها می میرند
و زنان در پی آلودگی من بودن
زیرِیوغِ اَلَمِ تنهایی
چادر شرم به دندان حیا می گیر
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بعد تو هجران فراهم می شود.
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بوسه ای بر دست من زد با وداع
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تیر فراق میرسد از شصت روزگار
بر قلب شبروان که در عشق مبتلاست
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نیمه شبی که جهان در خاموشیست،خودم را ترک میکنم....
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به رستاخیز دل بستم که شاید
به داد ما چو مختاری بیاید
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این چلچراغ بر سر گورِ که روشن است
این شهر نیست، مظهر ویرانی من است
یا سفرهٰ ضیافت دزدانِ با چراغ
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لیوان ها همه الکی شده اند
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دیر زمانیست،
که جایت خالیست...
و من،
هر لحظه،
دلتنگ تر و دلتنگ تر...
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کسی جز من برای مرگِ من فردا نمی گرید
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خانه تاریک است،روشنایی رفت بامرگ پدر
آنکه صدسررانگه می داشت
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عشقم چه بی وفایی ، رفتی حالا کجایی
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رویای تازه ای در خواب خویش دیدم دوش
با روح پیوسته ی تو در من خداحافظی میکنم
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توی فالم اومده همین روزا
انگاری قراره از دنیا برم
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من قسم خوردم از این مسأله صحبت نکنم...
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پاییز
آخرین نشانی تو بود.
آنجا، که در برگریزان کوچه خیابان های رنگ و رو باخته ی شهر،..
محو شدی.
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حلالم آنچه میدانم حرامت میکند بر من....
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ای دلیل سعد و خیراتم
راستی تو شرح والضحی بودی
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مزار خورشید
دید خورشید آرمیده در مزار.....
مادرش آغوش خورشید و بهار.
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