جمعه ۲۱ آذر
شعر چرخه زندگی
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ببار آسمون ببار به یاد سادگی ببار
گل کن ای زمین تو این خاطره رو به روت نیار
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خدایا مانده ام در انتهای شهر تنهایی
صدای رنج در گوشم طنین انداز بی تابی
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خواستم در واپسین نفس هایم شعری نویسم که من را یاد کنی
دیدم شاعری را نمیدانم
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کارما، میخزد درسکوت شب،سایهٔ ای که هرچه می دانیم پیشاپیش دیده است..
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من در لابهلای همین غمها پهلو کردهان
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من بودنی سرتاسرم خاک نهالی دیگرم
آنجا که در خاکسترم با خاک میپوشانیام
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وقتی که حریف ، بسته راه رخ را
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میدرد تا به گریبان عدم زندگیام
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خشکسالی شعری از علی دولتیان
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مروری بر گذران زندگی و چرخه تغییرات مسئولیت در زمان
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لالالالا گلِ میخک!
رو گونَت مونده ردِ اشک
نترس چون اخرش غم هات
تموم میشن یروز بیشک
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آرزو در سایه ات بیدار می گردد پدر
درد ها با یاد تو بیکار می گردد پدر
دست یاری را چو بر دس
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شکایت کی کنم از تو
در این دنیای پر شاکی
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یلدا شروع قصه و پایانِ ما بود ...
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به شاهی می رسد از فقر هر کس اهلِ دل باشد ..
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به هر سو بنگری آشوبِ پنهان دیده میگردد
دلِ مردم زِ داغِ نان، پریشان دیده میگردد
کجا رفت آن صدا
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هر مهاجر نا آگاهی
می شود غرق ظاهر سازی
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حتی سنگینترین غمها نیز، مانند مهمانی ناخوانده، پایدار نیستند و روزی محو خواهند شد.
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اَی خوش اون دورا زَمون کا پاچه خواری مد نبود
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اشک و سکوت خلاصهی دردم بود...
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منم با خنده خوش اما به غم محکوم بودم...
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گردی نشسته بر همهی شیشههای شهر...
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اشک و سکوت
خلاصهی دردم بود
و...
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آنجا که
زمان خط ندارد،
نه رفتنی هست
نه دوریای.
آنکه رفته
در نورِ دیگر
میایستد.
آرام با
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از
من گرفتم تو نگیر
تا
من نگیرم تو بگیر
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پای بی حوصلگی های خودش پیر شده
دهه ی شصتی از هر طرفی پا خورده
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بادبادک زیبای کودکی هایم راباد برد....
عشق نوجوانی هایم در هجوم ، ژاله و باران بمُ
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نشخوار می کنم خود را
درونِ آینه...
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تولد.علمی فلسفی
زندگی میدانِ جنگ است طفل ما
لیک جانا سخت باشد در خفا
آمدن دنیا چه سخت است این ب
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باز باران با ترانه
بوی اسپند و گلابُ
آب و شانه
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مغزمان را پخت و گرگان را طعام خام داد
آن خدا وقتی به شیطان اختیار تام داد
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دیشب گلدان شمعدانی خواب دید
بر لبه حوضچه فیروزه ای خانه مادر بزرگ نشسته🩵
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نشسته روی خاطرم غبارهای بیکسی
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ما قرنها زیر سم اسب تو هستیم ...
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من آن لحظه را به خاطر دارم 🌌🌠
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افسوس ما هر روز را تکرار میکنیم
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از ندانمکاری
چشمه ها می میرند...
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دنیا ندارد با دلِ تنگم، سَرِ یاری
راضی به تقدیر خودم؛ از روی ناچاری
پای تعقل گوییا در ذهن من گی
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اون روزای کاغذی....
من بودم و خاله قزی.....
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طعمه گذاشتند
بر جادۀ امن و خالی از بودنها.
نه! انسان عاقل است.
دام, مفهومش روشن است.
جایش در
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اگر کوری مسیرش پر خطر باشد
و این کور از قضا لجباز و کر باشد
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باید که مداوم بروم نزد روانکاو
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سند داریم ، زین دنبای فانی
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دوستِ الدن وِئرمه قربتدیر سنه
تک یاشایش اِئتمه محنتدیر سنه
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اصرار نکن هر آنچه دیدی باشند
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در وصف جبر جغرافیایی، سیاسی، احوالات جوانی متاثر از جهانی پلید..
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چون بلوطی پیر عمری سایه سارت بوده ام...
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من پیامبری از جنس درد بودم...
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باز در فصل خزان شد برگِ گل پرپر چنان ..
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