جمعه ۲۱ آذر
شعر چهار پاره
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اگر آنروز شعرم را نمی خواندی
اگر آنروز شعرم را
رها از هرچه در دنیا نمی خواندی
اگر آنروز سوی خود
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لختی برای این که بدانم که کیستم
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صبوری کن منِ معصومِ بیتاب/
صبوری کن منِ خاموشِ تنها/
ببین آیینه هم هر لحظه دارد/
صبوری میکند مث
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هزار مرتبه گفتم مرا تو خواهی کشت
شبیه شاه شکارِ جسور کرمانی
بخوان نماز و پس از آن تپانچه را رو کن
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بغضم ... از اعتراض میگویم
از جنونی که کرده شعله ورم
سال ها سایه سیاهی و شرم
مثل یک روسریست، چف
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کاش میشد لحظه ی سرد وداع
گرمی حس تو همراهم شود
در دیار مقصدی بی بازگشت
یاد چشمان تو درگاهم شود
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پونهای خشک است قلبم در گذرگاه نسیم
باد هم گر بگذرد یاد تو احیا میکند
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شعر دوازده روز
از کیمیا ساعیان
*قسم بر خاک پاک مام مهدم
همان خاکی که هر جایش شهیدی ست
*ز نسل آ
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در خاک و خون، لبتشنه مردان خدا رفت
تیر ستم، تا عمقِ جانِ اولیا رفت
با حلق خشک، آیات قرآن را سرو
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کاش عشقم همچنان عشق تو بود
کاش میلی بود از تو با دلم
کاش از رفتن پشیمان میشدی
کا
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آب حیات زندگی من شد
آه ای غریب آشنا لبخندت..
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خدا هم شانه هایش درد می کرد ...
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قد علم کردهای از هیچ که یعنی چه شود
سر هر دامنه یک پیچ که یعنی چه شود
بگو ای شاعر این شعر پر از د
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من زنم،عاشقم ،بقرآن که
عشق هم اشتباه می خواهد
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غصه ریزان است وچترپاره ای دردستمان!
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دانشکده اپیدمی جرم میفروخت
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خود چو پروانه ز نو آرائیـــــــــم
کان نبودیم و این چون مائیم
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نه ماه در بطن ِ رحِم گفتم :
« من نطفه ام باید پسر باشد »
گفتند : « ساکت .. هیس .. شرمت باد
دختر
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تردید احساس عجیبی نیست
من دور موندم از خودم انگار ...
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با ائتلاف دغدغه هایم تمام شب
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تلالو کرد عکس او درون آتش اشکم
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موی سپید و روی نزار مرا نبین
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تو باش ونام مرا باز هم ببر به زبان
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