جمعه ۲۱ آذر
شعر آزاد
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قطره اشکی چکید و خود را رسانْد ،
به خط میان دو لبم و،
کامم را شور کرد
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بی تلاوتِ تو،
حیرانم دراین محشرکبری
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چقدردوست دارم من ، گنجشک ها و سنجابها را
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در پای درخت گیوه ها را بکنیم
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«فرشوگر»
آه ای مادر،
میهنم، ای ایران،
آسمانت تاریک، آلوده،
رودهایت، چون رگ غیرت ما،
بر بستر س
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تا جوانی ، قدرِ جانت را بدان
پیرکه گردی ، جان نمیمانَد رفیق ،
تا که قدرش را بدانی
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مرا باش که تا چند وقت پیش ،
به زیر عَلَم ات سینه میزدم
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با اینهمه خار و خَس ،
اینجا شده خارزار
صلح کجا بود اینجا ؟
دراینهمه کارزار
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حال ما خوبست
اما تو باور نکن ...
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لیلا آهسته به مجنون نظر انداخت و گفت:
«شبِ ما بیتو چرا اینهمه بیتاب گذشت؟»
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بیچاره و زار، چو آسمون جُل
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همه چیز نمادین و دروغ
....
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آلما دئسم یوخ ، هیوا دئدیم گل
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تالابم و مرغان مهاجر،
میهمان منند امروز
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شاهپرم کَنده شده
ازبرخورد با سیمهای خاردار
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این حالتِ استیصال ،
حالتِ یک دریوزه میمانَد
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تویی ز قوم بربر
منم ز کاخ مرمر
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پرتو نور نگاهت ، زندگی باشد مرا ای مادرم
خستگی ها از تنم بیرون شود با خنده هایت مادرم
من به یادم
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در حافظه ام عکس تو نقش بسته است..
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دراین دنیای مالامال ز تبعیض
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....................................................................................................
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این شور نیمایی است یا عشق فرهادی؟
این زوره کش یا باد؟
من نمیدانم
هر چه بادا باد
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در را بگشا که اینجا ،
گیر افتاده حبسم
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سوزاندن است تا سوختن
پایانشان اما یکیست🔥🔥🔥
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یک جرعه از سَحَر نوش
مست میشوی تا برزخ
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ساعت دیواری ام کوک است
حال ...
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کلِ هنرت اینست اِی شمرِلعین و ابله !
که برکَنی سَرها را ز تن ها
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دیروزِ منی و،
همه فردای منی تو
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تو که خیلی ادعات میشه تکی !
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در تنازع بقا ،
شیر گشنه ای دیدم ،
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چقدر آه بکشم که ترکم کردی...
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نشخوار می کنم خود را
درونِ آینه...
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هیچگاه مجبورم مکن ،
دَمخور شوم و،
احترامی بگذارم ، به آشغال
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چو افتاد برگ خزان بر زمین🍁🍂
دل افتاد در دام آن نازنین💙 💍
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نیم جِناقو داد دختره به پسر
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آه که هنوز نمیتوانم آهی بکشم...
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زمانه هیچ مشکل نداشت با ما
خودمان مشکل را ایجاد کردیم
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سفری در میانهٔ ترس و تپش؛
آنجا که زمان بیرحم است
و دلِ ناآرام هنوز ادامه میدهد.
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تازگیها تا فارغ میشوم ز غنا ،
میروم سوی غنودن
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پایان این تعزیه کجاست ؟
پس تکلیف نمایشهای کمِدی بگو چی شد ؟
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من آن لحظه را به خاطر دارم 🌌🌠
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روباهی به بوقلمون گفت :
چقدرما شبیه همیم
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ای جوانی گم شدی در شام پیری و ملال
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چون هما ،
استخوان را قورت میدهم ، تا ...
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تو دریایی
من با ارفاق، یه قطره
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اینکه به کجا میروم هیچ برام مهم نیست
مهم اینست که یارم بهترین مهمان نوازست
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در خماریش مانده آن انسانِ همیشه گرفتار
همیشه جدا مانده از لذت جوانی
آسیبهای مانده در روانُ حاصل
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طعمه گذاشتند
بر جادۀ امن و خالی از بودنها.
نه! انسان عاقل است.
دام, مفهومش روشن است.
جایش در
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فنجان شکست و قهوه ی تُرک ریخت
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دریا شکافت و، یهود رد شد ازآب
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تقدیم به دوست عزیزم علیرضا
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بی تو دل خسته ی من بی پناه
هر نفسش گریه کند در نگاه
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