جمعه ۲۱ آذر
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اشک و سکوت خلاصهی دردم بود...
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منم با خنده خوش اما به غم محکوم بودم...
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امروز از آن عصرهای خوب جمعه است
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بهانه میکند دلم ، بگو شتاب میکنی
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تو که خیلی ادعات میشه تکی !
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جمعه باشد تو نباشی
دل من میگیرد
جمعه بی دیدارت
نفسم میگیرد
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ای شمس من ای مــاه من
ای مونـــــــــــــــــــس آگــاه من
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دوس دارم بارون بزنه/ باز برم بیرون از خونه
بعدش بیام دنبال تو / خوب کنم حسّ و حالتو
باز بگیرم دست
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گردی نشسته بر همهی شیشههای شهر...
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اشک و سکوت
خلاصهی دردم بود
و...
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«آنکه دائم هوس سوختن ما میکرد»
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آنجا که
زمان خط ندارد،
نه رفتنی هست
نه دوریای.
آنکه رفته
در نورِ دیگر
میایستد.
آرام با
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دلخستهام و دگر نای ندارم
ای وای که من میل به دیدار ندارم
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در تنازع بقا ،
شیر گشنه ای دیدم ،
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بشنو از عاشقی که در هیاهوی این شهرِ بیرحم، هنوز هم، با دیدن یک گل سرخ، یاد معشوقهاش میافتد و دلش،
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زیر چتر مهر
بیست و پنج آذر
شب به هر نگاهی پنجه بر چشمک می زد
در ره عشق سکه ها پرتاب
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مثل شعری مثل بارون
مثل لبخند رو لبامون
وقتی خوشحالی عزیزم
با تو میخنده خدامون
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به نام خدایی که منو آفرید
که جانها را، ز لطفش زندگی رسید
کاشکی نگاهی به من میکردی
چو چراغی د
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تمام هفته امیدم به جمعه است و قرارش
چقدر بر تنم ای قلب بی قرار می آیی
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روزای آخرمون/ سرد شدی تو آسون
پی غریبه رفتی/ ساده ازم گذشتی
در پی پول بودی/ از من ملول بودی
من
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این گونه دعوت شده ام
به رسالت آیین مهر
وقتی که دستان ایزد مهر گیتی
دستانم را به رسالتی این چن
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میکده گیرد غم بیچاره دل ات را
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قصه های زندگی که هیچوقت از یاد نمیروند.
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این شهر مربوط به عشق نافرجام دوران جوانی از دوست داشتن و تردید از باختن و سوختن
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چقدر آه بکشم که ترکم کردی...
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🌺 🌺 امشب،
میخواهم تو را تصویر کنم —
ای نقاشیِ خدا... 🎨
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از
من گرفتم تو نگیر
تا
من نگیرم تو بگیر
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درون ِ کهکشانی از مقوله ها معلّقم
بیا اِراده باز هم بِبر مرا از این فضا
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سفر می رفـتی و دلتنگی ام انکار می کردم
ولـی در انـزوایـم گـریـه ی بـسیـار می کردم
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از شرابِ سرخ بیزارم چرا نوشم که هست
هر کلامت شربِ من مستِ روانِ من تویی
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عمر من رفت به پای تو دلم پیر شد
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ترک ما کردی و گشتی همنشین آن رقیب
شد دلم آغشته در خون از غمت ای بی نصیب
رفتی و در سینه ام طوفان
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پای بی حوصلگی های خودش پیر شده
دهه ی شصتی از هر طرفی پا خورده
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پرندگانِ پرزدهیِ
پرکشیدهیِ پراندیش
گاهی نه به دوردست
که از دست میروند.
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مثنوی
《مثنویِ خون در دل》
میبینم او را با دوچشم ،
آری دوچشمه، خون فشان
او گشته ،در جانم شرر
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عشق در لشکر خود مرد خطر میخواهد..
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من که دلتنگ توام اما چرا شب بیشتر
مینویسم از تو اما از خود اغلب بیشتر
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چقدر سخت گرفته ای ، عزیز ساده پوش من
گلایه هات می رسد ، هنوز هم به گوش من
چه کرده ای تو با خودت ،
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بادبادک زیبای کودکی هایم راباد برد....
عشق نوجوانی هایم در هجوم ، ژاله و باران بمُ
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کجایید فراموشکاران بی انصاف
که جهان دوباره خسته میشود
از عدالتی که به خواب رفت
از کودکی
که
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نشخوار می کنم خود را
درونِ آینه...
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من ز دست زلف مشکینت خطاها دیده ام...
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روزی مرغکی درقفسی زار به دلدارم گفت:
من رهابودم ز بند و قفسی ، می پریدم....
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رفتم در آتش عشق، ولی سردم هنوز
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چرا با دل نمیجنگمْ چرا با چشم نمیجویم
با اهلْ بودن های توخالیْ پی انکار نمی گردم
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هرچه تقدیر است بر ما بیش ویا کم آن بود
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هیچگاه مجبورم مکن ،
دَمخور شوم و،
احترامی بگذارم ، به آشغال
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تولد.علمی فلسفی
زندگی میدانِ جنگ است طفل ما
لیک جانا سخت باشد در خفا
آمدن دنیا چه سخت است این ب
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خداوندا ترحم کن زفضلت بر دل ما
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