جمعه ۲۱ آذر
اشعار دفتر شعرِ بوی خیال شاعر مهدی محمدی
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میراث نیاکان من، رنج مزرعه است
عرقی ست که زیر نور آفتاب می سوزد
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چه سازها بدل کردم
هنوز جای گوشه ی چشمانت خالی ست
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ماه خنجری ست
بی نگاه
چسبیده به قابِ «دوستت دارم»
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تقدیم به جانبازانی که در رویای خمپاره ها سوختند.
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دلم یاد گذشته هایی می کند که نمی آیند
آقا کلاهش را بالاتر می گذارد می دزدند
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به تاریخ که نگاه می کنم
بهمن در خونم فواره می زند
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روزی من و تو
آزادی را در آغوشِ مردم می باریم
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برف روی سر مادرم نشسته است و زار زار می گرید
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شاید دنیا سیبی ست در دستِ حوا،
واقعیتی در مرزِ توهم
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تمام من از داغ لاله لبریز است
آری من یک نقطه از شب را پنهانی در سینه ام جا داده ام
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برف می بارد
آسمان هست بی تاب
کولاک
از پشت پنجره ی بهمن ماه...
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دوباره دلم هوای تو را کرده است.
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دنیا همه چیزش خوب ست
حتی صدای کریه کرکره ها را می توان پایین کشید
شب روی پاهایت می خوابد با تمام ن
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می ترسم آزادی تعبیرِ خوابِ آشفته ی طناب باشد
یا شاید هم سودای شب در گاه گاهِ لرزشِ چهارپایه
تنهایی
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سرم را در درد بپیچید
در جوارِ تنهایی ام سایه ام را پشتِ در رها کنید
اسیرِ هیچ خوابی نخواهم شد
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زیر شاخ و برگ های کاج
در سرخی غروب باد ملایم می رفت...
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مرگ شیرین به جانش وابسته بود
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عبدالله پسر عمر بر گرده ی ماه، آه می کشد
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دیشب دوباره باد پیراهنم را با خود برد
مقدس تر فریاد کشیدم.
پیراهنم از صدای زخم و تازیانه بر تنم لر
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نور از پشت پنجره می تابید
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کاش این جمعه برایم می باریدی
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آسمان کبود
خواب درخت ترانه ی گنجشکان و
تشنگی گلوی پرنده را گرفته بود.
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ماه را به صلیب سرخ بسته اند
بیش از هر وقت دیگری صدای تیر می آید.
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روایت تاریکی اگر چه غمگین ست
با گلوی گرفته داد می زنم.
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مشق می نویسم
تا نیمه های شب، شبِ کودکی
چهره ی روز سیاه ست.
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عشق خطای دل بود و
سنگش را به سینه می زدند.
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در چاه زنخدان تو افتاد
ابله دلم
که می خواست جای خالی را پر کند
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یک بوسه به من داد صبح و هزار کار نامشروع انجامداد با شب
و بعد خواب نابرابر و پرواز اندوهی برای من
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با آه ناخوانده می خوانمت
در پیچ و تاب باد و در اندام نحیف نور
گاه پیدا شدن بود و قابله سرخ موی
د
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در هلال آزادی
داس مه نو می بینم و
مزرع سبز فلک را آرزو می کنم
از
کشتزار آدم
تا
کشت گاه آدمیت
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از جرم ثانیه ها
تا شلاق بر پیکر زمان
پشت تاریخ خونین
ساعت چون ریزعلی
پیراهن از تن خود درآورده
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سرفه ی ضعیف ظروف روی اجاق دلتنگ
صدای موسیقیِ بسیار خسته کننده
تنهایی ام به دیوار تکیه داده
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کوه هزار بار غلط گفت
آسمان دست در گردن برادرش زمین انداخته می گرید
دریا دیری ست با آشفتگی نمی داند
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باران انشاء اش را ادامه داد
من در خیابان غریب اشک می ریزم
حجمی از نور تاریکی را می خواند از دوشم
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تفاوتی میان چند روباه
مرغ همسایه را همیشه غاز می کرد
می فرستاد خانه خدا و پیغمبر
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وقتی تقوا
لای ابرها جستجو می کرد،
سواد
از پشت کوه رسید
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با خواهران و برادرانم می گویم
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اول بار با زمین همبستر شد
بعد دید زمین با خورشید!
ماه دلش گرفته بود...
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راه می رفت دیوار
با سرگیجه های مدام
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پرواز
همیشه زیبایی پرنده نیست
ملکه ای در زندان
نگاه تو
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نان سیاهنور گرفت و سفره زخم هایش را در بهار نتوانست رفو کند
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ماه لکه دارم
روشنی شبهایم
از آرامش با من حرف بزن...
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آزرده ام
آزرده از یأسی که بر شاخ درخت سبز امیدم،
در راستای موجْ موجِ برگهایش
شبیه مرغ ماهی خوار
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تکیه داده ست به من دیوار
نفس خاطره در بند هوا مانده
فکر بی حوصله ی سرد اجاق
آینه
می زند زنگ ق
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چقدر در بغضم
شعر فروخورده از خون اشک می غلتد روی کاغذ
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آنجا که دل نقش می زند ای آفتاب!
من زنده ام
تا کرانه ی آبی دریا
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آموختنِ زبانی ساده
برای فهمِ
علاقه
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حجم تنهایی در میان سایه های سرگردان
یک عدد قرص مرگ
در دست تاریکی
و یک لیوان آب که از ماه خالی است
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از خستگی بیشترم
مشق های نانوشته و امتحان فردا
ترمیم زخم های زیر پوست زمستان...
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اسطوره ای به نام تو دل مرا
بعد شکست بی سبب
وصله ی ذره ذره غم به غم
-چگونه بُرد؟-
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حکایت میم بریده
ماه در ایوان زمستان سختی را داشت
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بنا نبود
سکوت خدا را شکستند
که آفرید
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با این همه شب عجیب
انتظار ایستاده در چشمانم
قد می کشد.
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تقاص آب را
از دیده هایمان گرفته ایم
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بر سر تیر چراغی می گفت
سایه افتاده مگر بر من؟
که به تاریکی هر جا نگهم افتاده ست
برده از من نفسم ر
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تربت خاک داشت
نفس آب را دادند
و ماه را کاشتند
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