جمعه ۲۱ آذر
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گفت: گر که رفتم تو مرا یاد کنی....
باز خاطرههایم را در ذهن خود آباد کنی...
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سحر خندید و شبهای من آغشتهٔ نور شد
که ماه از پیِ درخششِ سحر بال برافروخت
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فرار میکنم از دیدنت بهخواب و چه سود
به خواب هرشبه ام چهرهات پدیدار است...
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تو را از وهم میگیرم تو را از آینه از باد
اگر این لحظه بگذارد اگر از شب شوم آزاد
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شادی پَسِ هر خنده هُویداست بِخند
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پشت چراغ قرمز ستارخانم
آنجا که دادی راه رفتن را نشانم
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تکرار
من در این ایام پر رنگ و ریا
سر به دنیای خیالم می زنم
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به شبی مرغ سحر نالهزنان گفت به راز
که ز خاکی شو و از خاک بر افلاک پرواز
به درِ پیر خرابات،
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عشق در قاموس خلقت ، بهترین معنای تو ست ..
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چشمهایت،
مقدمهای
برای شروع داستانم؛
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جام من بشکستی و ماندم به جان؛ پس دوستت دارم....
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گریه کن تا آینه روشن شود از تیرگی
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بیرونِ غار
پُر بود از
نسخه های تکثیر شده حوا
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هیچکس شبیه تو نیست
چیزی کنارتو گم نمی شود....
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خوابِ آسوده نیاید همه شب در چشمم
تو که باشی، شبِ چشمت، شبمان خواهد شد
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تو راه عشق رامسدود کردی
مرا اینگونه تو نابود کردی
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چقدردوست دارم من ، گنجشک ها و سنجابها را
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دائما این پرسش از خود کردم آیا زنده ای؟
زنده ای وقتی که ناچاری چه فرقی می کند!
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در پای درخت گیوه ها را بکنیم
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مادر پرنده ایست که می خواند
بر صخره های سنگی طوفانی
مادر ستاره ایست که می رقصد
در آسمان ابری ظلما
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با سکوتی پر صدا شعری نوشتم آتشین:
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شب و یک کوچه ی تاریک و غمی پنهانی
من و بغضی که شکستی و خودت می دانی
چه کنم بعد تو دیگر همه اشعارم
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تا فراموش کنی چندی از این شهر سفر کن...
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«فرشوگر»
آه ای مادر،
میهنم، ای ایران،
آسمانت تاریک، آلوده،
رودهایت، چون رگ غیرت ما،
بر بستر س
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این شعر به مناسبت تولد بنده هست ، ممنون از همه عزیزانی که به بنده تبریک گفتند.💚
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آن روز
غروب غربت تو بود
در کوچه های سبز بهاری
آن روز
روز سرد و کسالت بود
و تنها آشوب غم
که ا
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وقتی تو را آغوش میگیرم
انگار دستانم
حلقهای امن
به دور رویایی دیرینه میبندد
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وقتی گره از موی خود،ای عشق من وا میکنی
دنیای محزون مرا، حقا,,که زیبا میکنی
من یک نهنگ عاشقم،
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رژه در جنگل
مورچه های سرباز
قامتشان خم می شد
زیر بار گندم ها.
ترس در چشمان
مگس حقله می زد؛
م
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قرنها پیش،
جایی در دلِ آن سالهای دور،
نسخهٔ کودکیِ من
دلبستهٔ نسخهٔ کودکیِ تو شد.
در همان ر
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آمدم عشق خودم را به تو اِبراز کنم
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سه چارانه+ دکلمهی غزلِ الیاسِ من
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یک رباعی+ خوانش غزل ۲۷۱ از کتاب نوای احساس
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بر یک نظری کنی به ذاتش کاشی
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با خیال خام ماهم شانه کردم آه را
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رسیدهام ولی افتادهام زیر پا،
چرا کسی از زمین برنمیدارد مرا؟
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تا جوانی ، قدرِ جانت را بدان
پیرکه گردی ، جان نمیمانَد رفیق ،
تا که قدرش را بدانی
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ماندی وسط معرکه تک خال نداری
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کجای حادثه از من گرفت جانم را
کجای معرکه از دست ها توانم را
کجای مرثیه ها یادگار مرگ تو بود
کجا
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دنیای قشنگ من تویی تاج سرم
خدا بخشیده به من تورو ای مادرم
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من پارسیم؛
از فرّهِ کیانی سرشته،
از نژادِ کیخسروِ نیرومِهر،
آن شاهِ آذرنگی
که اَهوراییترین فروغ
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من در لابهلای همین غمها پهلو کردهان
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در ملاقات با کلمات
رها کن حرف های حبس شده را
تا شعرهایت
از لا به لای درز آجرها
از بلوغ واژ
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این یتیمی کی شود یک لحظه درمان، ای پدر
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دلم و قربونی کردم پایِ تندیسِ تنت
ردّ اشکامو ندیدی رو گلای پیرهنت
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