جمعه ۲۱ آذر
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برقی زد و کس طور سینا را نمی دید...
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یک پرده فیلم رنگی در ماجرای عشقی
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داری زیر بارون غرق میشی بیاد روزایی که گذشتند...
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شاید تحمیل عقدی باشد.......
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تو جاده های دلهره
دور از تو پرسه میزنم
تنهایی تن پوشم شده
درگیر وهم مردنم
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نامه های کاغذی
حتی با عشق و دلدادگی
میشکنن تو دست آب به سادگی
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بر تار و پودِ شب می آویزد
شعاعِ نوری که از زِهدانِ ماه می تَراود !
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شورى به سر فتاده كه من زار ميزنم
حرفى به دل بمانده به دلدار ميزنم
اسپندوار سوزم و مى نالم از شرر
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برآن تربت که هست تنهای درغربت
هزاران باربادرحمت
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(جنگ؟)
طالب و داعش ودولت باز جنگ
می شود بار دگر آغاز جنگ
پس چرا در کشورم این ماجرا
روی بام شهر ت
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اینهمه نیکی به من مادر نکرد
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می توان یافت کجا ردّی از آزادی محض
جز در افسانه و تمثیل و حکایت شاید
یا به پیشانی میدانگاهی
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بی حضورت نظم و نثر و دفترم گم می شود
راه و ماه و مقصد و چشم و سرم گم می شود
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تك درختی شد بيابان را پديد //
در زمستان سختي سرما چشید
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آدمک زندگی یک خیاط است....
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ببار ای ابر بارانی تو بسیار
نما دشت کویررا همچو گلزار
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بر دوش کشم حسرت تنها شدنم را
با اشک بگویم غم دریا شدنم ر
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گمنـــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــام
بی تو کار از کار گذشته است، تمــــــــــــ
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از همین حال فنا دلم دلگیر غم هست
که این دنیای بنده چه ها کرده مرده
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حال دل را توبه هرآیه که میخوانی نیست
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جاده ها از تو شروع و به تو خلاصه میشوند،
و تو همان جا مانده ای بی تحرک در یک خیال متروکه...
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چون کفش طفل بي نوايي تنگ، اما/اين عشق مجبور است بايد پا بگيرد
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بی راهه کجا?... راه کجا?... *** راه نشانم بده ای راهنما...
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آیینه تویی نور تویی پنجره ای تو /
آرامش جانی پدر ناز و عزیزم /
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مه در محاق رفته و نوری نمانده است...
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و باز این دختر پاییزی متعجب به گذر ساعت ها
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این بار اگر آمدی اسپند بیاور...........
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سمبولیسم در ترور وحشت می میرد
با سه همزاد غریب بشر:
آ
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تقدیم به دوستان عزیز شعرناب
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تقدیم به مهربانو
نیره ناصری .......
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شاعری تا نیمه شب خوابش نبرد ..
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دیگرانت عشق می خوانند ومن سلطان عشق...
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دوش چه نیکو سحری داشتم
گفت و شنود باقمری داشتم
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شباست و ديدهي دلرا برآسمان دارم
شگفت از همه هستي، زاين جهان
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مال تو تموم شعرام که همیشه از تو سرشار
مال من همین سکوتت غم چشمای گرفتار
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هفت سنگ
سینه ی برکه را
سنگ نزن !
پیکر زخمی ماه را نمی بینی مگر ؟!
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بی سرو سامان توام ، بی سر کربلا
جیره خور نان توام ، دلبر کربلا
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من که در شاد ترین ثانیه ها غمگینم...
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گویی تو را به ابدیت فرا می خواند
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می شود زنگار دل پاک از صفای دوستان
می زداید غم زجان،مهر و وفای دوستان
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به چشم ودل نشو عاشق،حذر کن
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که گناه تو شود مشکل دینم، خوبست
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آیین و قبله گاهم – ناز بانو ناز بانو
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تو رستاخیز بر پاکرده ای با تاب گیسویت
عجب شَقُّ القَمَر کردی با هر تیغ ابرویت
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من بسوزم در تب؛
تو چه با آرامش، اول شب
میزنی ساعت خاموشی را...!
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