جمعه ۲۱ آذر
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گزیده ای از تک بیت های طنز مهدی احمدی
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هنوز فصل سکوتم به سر نیامده و/
هنوز هم که برایم خبر نیامده و/
هنوز هیچکسی از سفر نیامده و/
هنوز
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سپر کردم جوانی در بطالت
خواستم همه چیز و یافتم در وصالت
ناگه یافتم که دلم خالی است
می
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لحظه این جنون من،نیست طریق و مذهبم...
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سـلامی ز عـاشـق به معشـوق زیبا
بـه مـهـروی تـابـان بـه دلــدار گیـرا
ارادت عـزیـزم! چطـورست
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من آن روزی که بر دیدم تو را گفتم نه انسانی
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برای وطنم ایران که این روزها حال خوشی ندارد با آرزوی رهایی از همه ی گرفتاری ها
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من هستم و یک عصر پاییزی و بارانی
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حکایت جنون من ، بریده در جریده است
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دل من بی تو درآن شهر دگر تاب نداشت
آسمان بودی و ماه ام به شبت قاب نداشت
نگران بودم و شبگرد خیابان
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دریغا عشق را ، مهر و وفا را سر بریدند
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مرا باش که تا چند وقت پیش ،
به زیر عَلَم ات سینه میزدم
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اگر آنروز شعرم را نمی خواندی
اگر آنروز شعرم را
رها از هرچه در دنیا نمی خواندی
اگر آنروز سوی خود
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تو خندان روی و من خنـدان پسندم
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حاجی سعید مردی، دیندار و با کمال است
دیندار و با کمال است، با اینکه بی جمال است
از کربلا گرفته،
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تقدیم به استاد امیر علوی که پر از مهر است
مهر تو چون آبشار است
خنده هایت مثل گل
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من بودنی سرتاسرم خاک نهالی دیگرم
آنجا که در خاکسترم با خاک میپوشانیام
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وقتی که حریف ، بسته راه رخ را
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شهریار
سعی کردم تا بسنجم قدرت گفتار خویش
یک غزل بیرون کشم از خانه ی افکار خویش
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تو اگر چه پای ایستادن نداری و ستون جسم تو آسیب دیده
مرا باکی زضعف تن نباشد ، چو دین در قلب تو راه
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هوایِ دل چرا ابری،غمین است
چرا دل با غمِ غربت عجین است
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معمار و دیوار و ثریا و جهان، کج ...
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ای خواب هایم ،بیدار شوید...
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همواره در آیین پاک دل سپردن
عادی است دائم خویش را از یاد بردن
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پاییز و بهار ماجرا ها دارند...
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حال من حال کسی است
که دلش طوفانیست
و به دریا زده تا غرق شود.
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هرگز ندیدمت اما
آرزوی دیدنت را هزاران باره گریستم
بدان حد که غرقه شدم
در سیل اشکهایم
بیحد
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پاییز مثل من
برگ هایش را می ریزد
زیر پاهای عابرانی که نمیدانند
زیر سایه همان برگها قدم میزدند
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با اینهمه خار و خَس ،
اینجا شده خارزار
صلح کجا بود اینجا ؟
دراینهمه کارزار
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حال ما خوبست
اما تو باور نکن ...
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پروانه ها امشاسپندان ها فراوان ها
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یک کلاغ در کوچه ما
سالهاست
نکرده کوچ با ایلش؛
شاید تنهاست.
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و سیاهچاله
سکوت است
و سکوت
و سکوت
و گوش نسپردن
به فراصوت هولناک بلعیدن همه چیز
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از خودم دور میشوم تا با چشمهایت فقط سفر بکنم
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شبِ یلداست وای یار دلآرامم، بمان پیشم
که بینورِ تو تاریک است دنیایم بمان پیشم
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چقدر این جان جنونش را بکارد
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خاطرات من
و پاییز این سکوت
مرا به روزهای تو برمی گرداند
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من معادلهی غمم؛من را حل کن.
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لیلا آهسته به مجنون نظر انداخت و گفت:
«شبِ ما بیتو چرا اینهمه بیتاب گذشت؟»
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قصهیِ عشق مرا میل به افسانه زدند
گوهرِ جانِ مرا قسمتِ بیگانه زدند
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در مورد مادر و زیبایی زندگی در کنار مادر است.
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دلم به بوی تو آغشته شد سپیده دَمان
چنان که شب ، نفسِ باغ ، مستِ بادِ خزان
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نمیدانی چه تلخ بود رفتنت!
چه سوزی داشت این نگاه آخرت،
چه دردی میکشد دلی که میماند...
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قلبیم نه جور فِکر اِئتمیسن ، عُذرینده اول تقصیرلارا
اوندان سنه چوخلی وفا ، سندنده کی چوخلی جفا
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🩵به راه تو برگشتم، یا رَب، همین مانَد
عهد نو، تو را بستم، یا رب، همین ماند
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