جمعه ۲۱ آذر
اشعار دفتر شعرِ شعرگل سرخ شاعر نوید حمیدی فر
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بادبادک زیبای کودکی هایم راباد برد....
عشق نوجوانی هایم در هجوم ، ژاله و باران بمُ
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بوی تو را می شنوم از خاک......
عطر استخوانهای تو را دارد.....
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اون روزای کاغذی....
من بودم و خاله قزی.....
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افسانه زائید ، خانه ی خالی نایاب شد!......
مرغ مارا گربه برد ، نان خالی باب شد!....
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عشق درفلسفه ی آئینه آمد....
عقل ازقاب آئینه پرید......
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من صدایت را شنیدم ، پس گوشهایم رابه سمت صدای
توبازکردم....اسم زیبای تورابا نوک انگشتانم احساّس....
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خم اَبروی تو و طَرفه ی گیسوی تو باز....
دل من دست گدایی، سوی توآورده نیاز....
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ای جامه بخودپیچیده برخیز.....
که آمدوقت دیدارمن وتو....
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دست کوتاه من ودامن چین درشکنت.....
سرافتاده به پای تو و،خال لبت ای یاربلند....
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ای عشق،ای عشق،ای آبی پسندیده......
ای بیکران به خلوت عاشقان درآمیخته....
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گریه کردم برسرگورت بادموهایم رابه هم می ریخت...
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احساّس پری دارم که معلّق مانده درهواست......
می بردبادمراهرسو،گشته ام بازیچه اش.......
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ازگوساله ای پرسیدندکه توچرادرطشت فلسفه
آب می خوری؟.....
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من سکوت حسن وفریادعلی درچاهم.......
من خون حسینم،شمشیربران علی(ع)........
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چون شب به خانه های کوفه خزید......
ماه ازآسمان به زیرزین افتاد.....
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فاصله افتادبین من ونگاه تو......
گوش من وصدای تو،کِلک من وخیال تو.....
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کاش دردنیاهیچ زنی موهای کوتاهی نداشت.....
عمریک عشق به کوتاهی یک روززمستانی نبود.....
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همه رفتندکوچه رنگ سیاهی گرفته است.....
ازکنارخیابان تادرخانه راخطّ کشیده ام.....
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خاک می گوید:حسین.......افلاک می گوید:حسین.....
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به یادآرآن روزهای،دلکش وشیرین.......
آن روزهای شادرادرزیرباران.......
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